कलचुरिकालीन राजनीतिक इतिहासः रायपुर शाखा के विशेष संदर्भ में
डां. अंजू तिवारी1, प्रीतम2
1षोध निर्देषक, इतिहास अध्ययनषाला, सहायक प्राध्यापक डाॅ ़सी ़वी ़रमन विष्वविद्यालय करगी रोड़ कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)
2शोधकत्र्ता, (एम. फिल.), इतिहास अध्ययनषाला, डाॅ ़सी ़वी ़रमन विष्वविद्यालय करगी रोड़ कोटा, बिलासपुर (छ.ग.)
*Corresponding Author E-mail:
शोध सारांश:
छत्तीसगढ़ के इतिहास में कलचुरि राजवंष का महत्वपूर्ण स्थान है। छत्तीसगढ़ का वास्तविक राजनीतिक इतिहास कलचुरि राजवंष की स्थापना के साथ आरंभ होता हैं। कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ पर लगभग नौ सदियों तक (875-1741ई.) राज्य किया। कलचुरि (हैहय) ने भारत के अनेक स्थानों पर शासन किया। उनकी कई शाखाएॅ थी जिनमें से दो छत्तीसगढ़ में स्थापित हुई:- रतनपुर एवं रायपुर।
रतनपुर , रायपुर।
प्रस्तावनाः
छत्तीसगढ़ के इतिहास में कलचुरि राजवंष का महत्वपूर्ण स्थान है। छत्तीसगढ़ का वास्तविक राजनीतिक इतिहास कलचुरि राजवंष की स्थापना के साथ आरंभ होता हैं। कलचुरियों ने छत्तीसगढ़ पर लगभग नौ सदियों तक (875-1741ई.) राज्य किया। कलचुरि (हैहय) ने भारत के अनेक स्थानों पर शासन किया। उनकी कई शाखाएॅ थी जिनमें से दो छत्तीसगढ़ में स्थापित हुई:- रतनपुर एवं रायपुर।
जिस प्रकार प्रबंध के उद्देष्य से त्रिपुरी की एक शाखा तुम्माण में बिठाई गयी थी, उसी प्रकार तुम्माण की एक शाखा प्रौढ़ होने पर खल्लारी में स्थापित की
गई। रायपुर जिले में खल्लारी एक प्राचीन गांव है। मल्हार षिलालेख से पता चलता है, कि लक्ष्मीदेव रायपुरी हैहयवषी राजवंष के संस्थापक थे। जो रतनपुर के हैहयवंषियों की ही एक शाखा थी और उनका शासन काल 1300 ई. के आसपास रहा होगा।षिलालेख के अनुसार, 14वीं सदी ई. के अंतिम भाग में रतनपुर के राजा का रिष्तेदार लक्ष्मीदेव प्रतिनिधि स्वरूप (आधुनिक खल्लारी रायपुर जिला) भेजा गया और वह वहीं का होकर रह गया लक्ष्मीदेव के पुत्र ने शत्रुओं के 18 गढ़ जीत लिये। सिंघण ने रतनपुर नरेष की प्रभुसत्ता मानने से इंकार कर दिया। सिंघण के बाद उसका पुत्र रामचन्द्र रायपुर का शासक बना। रामचन्द्र देव के बाद उसका पुत्र ब्रह्मदेव रायपुर का शासक बना।
रायपुर में शासन करने वाले कुछ कलचुरि राजकुमारों के विषय में रायपुर के खल्लारी षिलालेखों में कुछ उल्लेख मिलता है। अभिलेख 1402 व 1414 ई. के है। इसमें बताया गया है, कि रायपुर में एक राजकुमार शासन करता था, जिसका नाम लक्ष्मीदेव था।1
रतनपुर के कलचुरि शाखा ब्रह्मदेव के दो षिलालेख प्राप्त हुए है। उनमें से एक विक्रम् संवत् 1458 का है, दूसरा विक्रम् संवत् 1470 का है। इन दोनों षिलालेखों में दी गयी वंषावली से रायपुर के चार कलचुरि राजाओं के नाम ज्ञात होता है:-
1.लक्ष्मीदेव
2.सिंघण
3.रामचन्द्र
4.ब्रह्मदेव
इन राजा में से प्रथम दो राजाओं के नाम रतनपुर की वंषावली में भी मिलते है। जो वहां के राजा वाहर (वाहरेन्द्र) के पूर्वज थे। इससे ज्ञात होता है कि राजा सिंघण के डंधीर और रामचन्द्र नामक दो बेटों में से डंधीर को रतनपुर की सत्ता एवं रामचन्द्र को रायपुर की सत्ता सौंपी गयी। रामचन्द्र ने रायपुर नगर बसाकर अपनी राजधानी स्थापित की। ब्रह्मदेव के खल्लारी लेख से विदित होता है। कि रामचन्द्र ने फणी (नाग) वंष के राजा भोणिगदेव को जीता था।
रामचन्द्र के समय में छत्तीसगढ़ में कवर्धा और बस्तर में दो अलग-अलग नागवंषी राजाओं का राज्य था। किन्तु भोणिगदेव किस वंष से थे स्पष्ट नही है। उत्कीर्ण लेख से विदित होता है कि ब्रह्मदेव की राजधानी वर्तमान खल्लारी में थी। जहां सन् 1415 ईस्वी में देवपाल नामक मोची ने नारायण के मंदिर का निर्माण कराया था। ब्रह्मदेव के रायपुर षिलालेख से विदित होता है कि उसके शासनकाल में सप् 1402 ई. में रायपुर शुभस्थान में नायक हाजिराज ने हाटकेष्वर महादेव मंदिर का निर्माण किया था।
खारून नदी के तट पर महांदेवघाट में निर्मित मंदिर ही हाटकेष्वर महादेव मंदिर है। इसी लेख में ब्रह्मदेव के प्रधान ठाकुर (मंत्री) का नाम त्रिपुरारिदेव और पुरोहित का नाम महादेव जान पड़ता है। ब्रह्मदेव के बाद के शासकों के कोई अभिलेख नही मिलते है केवल अंतिम शासक अमरसिंहदेव का एक आरंग से मिला है। यह ताम्रपत्र विक्रम संवत् 1792 में जारी किया गया था, जिसके कुछ वर्षो के बाद नागपुर के मराठों के हाथ अमरसिंह का पतन हुआ।2
रायपुर के हैहयवंषी कलचुरियों का वैभवषाली इतिहास निम्नानुसार है।ः-
लक्ष्मीदेव -
रायपुर कलचुरि राजवंष के प्रथम शासक के रूप में लक्ष्मीदेव का नाम मिलता है। कलचुरि षिलालेख के अनुसार 14वीं शताब्दी ई. के मध्य में रतनपुर के राजा के रिष्तेदार लक्ष्मीदेव को प्रतिनिधि स्वरूप खल्लारी जिला-रायपुर भेजा गया। कलचुरि राज्य के प्रतिनिधि लक्ष्मीदेव ने अनुकूल वातावरण के कारण खल्लारी में स्थापित होकर कलचुरि राजवंष की नींव डाली।
सिंघण -
रायपुर कलचुरि वंष में लक्ष्मीदेव के पष्चात् सिंघण नाम का शासक हुआ। सिंघण लक्ष्मीदेव का पुत्र था। लक्ष्मीदेव के पुत्र सिंघण ने शत्रु के 18 गढ़ जीते थे। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सिंघण रतनपुर के राजा से बिगड़कर स्वतंत्र हो गया था। उयने रायपुर में अपनी राजधानी स्थापित की।
सिंघण के दो पुत्र थे डंधीर और रामचन्द्र। डंधीर कलचुरि राजवंष के रतनपुर के सिंहासन पर बैठा और रामचन्द्र को रायपुर राज्य का शासक बनाया गया। इस प्रकार रायपुर में कलचुरि राजवंष के प्रथम शासक के रूप में रामचन्द्र ने सत्ता स्थापित की।
रामचन्द्र -
हैहयवंषी कलचुरि राजवंष में रायपुर शाखा में शासक के रूप मेें सिंघण के छोटे पुत्र रामचन्द्र का नाम मिलता है। रामचन्द्र को षिलालेख में रामदेव कहा गया है। रामचन्द्र के पिता सिंघण ने 18 गढ़ जीते थे। रामचन्द्र ने अपने पिता द्वारा जीते इन 18 गढ़ों को अपनें अधीन रखकर, शांतिपूर्ण रूप से शासन का संचालन किया। इनके कार्यकाल में रायपुर नगर की बसावट एवं विस्तार कर राजधानी का रूप प्रदान किया।
ब्रह्मदेव -
हैहयवंषी कलचुरि राजवंष की रायपुर शाखा के शासक रामचन्द्र के पष्चात् उसका पुत्र ब्रह्मदेव गद्दी पर बैठा। ब्रह्मदेव महान प्रतापी शासक था। इन्होंने अपने कार्यकाल में राज्य में शांति व्यवस्था एवं निर्माण कार्य को अत्यधिक महत्व दिया था। इन्हें ‘राय‘ से अलंकृत किये जाने की जानकारी मिलती है। फलस्वरूप इन्होंने अपने नाम के आगे ‘राय‘ ब्रह्मदेव लगाना पसंद किया। कहां जाता है, कि हैहयवंषी शासक ब्रह्मदेव राय के नाम से ‘रायपुर‘ नाम पड़ा।
यहां नारायण मंदिर का निर्माण देवपाल नामक एक मोची के द्वारा कराया गया था। जिसमें नारायण की मुर्ति स्थापित है, जो छत्तीसगढ़ में सामाजिक समरसत परिचायक है। 1458 ई. के षिलालेख के अनुसार राय ब्रह्मदेव के राज्यकाल में नायक हाजिराजदेव ने रायपुर में हाटकेष्वर मंदिर का निर्माण करवाया था। यहां हाटकेष्वर मंदिर महादेव घाट स्थित षिव मंदिर है। ब्रह्मदेव के प्रधान ठाकुर का नाम त्रिपुरारिदेव और पुरोहित का नाम महादेव था। इसी महादेव के नाम से खारून नदी के इस घाट का नाम महादेव घाट रखा गया। जहां नायक हाजिराजदेव ने षिवमंदिर की स्थापना की थी। जो आज भी हाटकेष्वर षिवमंदिर के नाम से विख्यात है।3
कलचुरि राजवंषीय हैहयवंषीय रायपुर शाखा की जो नामावली पायी जाती है। उसमें ब्रह्मदेव का नाम मिलता है, न ही उसके पुरखों का और न ही रतनपुरी सूची में लक्ष्मीदेव का नाम पाया जाता है। यद्यपि रायपुर की वंषावली केषवदेव से आरंभ होती है। जिसका समय 1410 ईस्वी लिखा हुआ पाया जाता है। परन्तु 1402 और 1414 ईस्वी के मध्य में ब्रह्मदेव का राज्य था, जैसा कि षिलालेख में उल्लेख है। यदि केषवदेव का समय 1420 ईस्वी मान लिया जाये तो अलबता कोई बाधा नही आती। अतः रायपुर के शासक हैहयवंषी राजाओं की सूची निम्नानुसार है:-
1.केषवदेव 1420 ई.
2.भुवनेष्वरदेव 1438 ई.
3.मानसिंहदेव 1463 ई.
4.संतोषसिंहदेव 1478 ई.
5.सूरतसिंहदेव 1498 ई.
6.सम्मानसिंहदेव 1518 ई.
7.चामुण्डासिंहदेव 1528 ई.
8.बषीसिंहदेव 1563 ई.
9.धनसिंहदेव 1582 ई.
10.जैतसिंहदेव 1603 ई.
11.फत्तेसिंहदेव 1615 ई.
12.यादवसिंहदेव 1633 ई.
13.सोमदत्तदेव 1650 ई.
14.बलदेवसिंहदेव 1663 ई.
15.उमेदसिंहदेव 1685 ई.
16.बनवारीसिंहदेव 1705 ई.
17.अमरसिंहदेव 1741 ई.
18.षिवराजसिंहदेव 1750 ई.
इस सूची में वर्णित कलचुरि शासकों का शासनकाल उपलब्धियों की दृष्टि से विषेष महत्वपूर्ण नही है। जिय समय रतनपुर में पंत का आक्रमण हुआ। उस समय रतनपुर में रघुनाथसिंह और रायपुर में अमरसिंह नामक व्यक्ति शासन कर रहे थे।4
गजेटियर में सूरतसिंह देव का नाम छोड़ दिया गया है। बाबरेवाराम ने उनका नाम सम्मानसिंहदेव लिखा हैं। गजेटियर में बलदेवसिंहदेव के पुत्र का नाम उम्मेदसिंहदेव दिया है। बाबूरेवाराम ने उनका नाम मेरसिंह दिया है। रतनपुर नरेष तखतसिंह ने रायपुर शाखा के नरेष अपने छोटे भाई को जो पत्र लिखा था, उसमें उन्होंने ‘मेरसिंहदेव‘ ही सम्बोधित किया है, न कि उम्मेद सिंह। सन् 1689 का पत्र रतनपुर नरेष तखतसिंह ने रायपुर शाखा के नरेष मेरसिंह को जो पत्र लिखा था। वह इस प्रकार है:-
“श्री कृष्णकारी कान्ह विजय सखा स्वस्ति श्री महाराजधिराज श्री महाराज श्री राजा श्री राजा तख्तसिंहदेव राजे रतनपुर योग्य स्वस्ति श्री महाराज कुमार राजा श्री मेरसिंहदेव भाई प्रति लिखित अस जो तुम्हारे कई राज कई बटार दीन्हें मध्यस्थ पंच राजा श्री नरसिंहदेव आदि सो जगइ नौटदिन्हें सेवा राजगद्दी कई सलाह सरई की परम्परा कहि.... निबाहि देने जया योग बिदा जगई-
स्थान ग्राम
(1) रायपुर - 640
(2) राजिम - 84
(3) दुर्ग - 84
(4) पाटन - 152
(5) खल्लारी - 84
(6) सिरपुर - 84
(7) लवन - 252
यह परिगन सात सात भोग करि कई वर्त बूक करत जाइ। सही कातिक सुदी 5 संवत 1745 सही रामधार देवान कह तथा बाबू राम साय देवान।”5
अतः रेवाराम बाबू द्वारा दी गयी सूचना अधिक प्रामाणिक सिद्ध होती हैं। इसी प्रकार मेरसिंहदेव के पुत्र का नाम गजेटियर में बनबीरसिंहदेव दिया गया है। रोवाराम बाबू ने उसका नाम बरियारसिंहदेव लिखा हैं। देवनाथसिंह की भांति मेरसिंहदेव को भी रतनपुर से रायपुर शाखा का सिंहासन संभालने के भेजा गया था। वह तख्तसिंह का छोटा भाई था।
संभवतः
बलदेवसिंहदेव का कोई पुत्र नही था इसलिए यह पराम्परानुसार व्यवस्था की गयी थी। एक षिलालेख पुरानी बस्ती में स्वतंत्रता सगं्राम सेनानी स्व.नंदकुमार दानी के निवास स्थान से प्राप्त हुआ था। यह षिलालेख भी 14-15वीं शताब्दी का है।
इस षिलालेख का उल्लेख सर्वप्रथम मुनि कांतिसागर ने खण्डहरों का वैभव में किया किन्तु वे ठोस जानकारी नहीं दे पाये। तत्पष्चात् बालचन्द्र जैन ने षिलालेख का वाचन कर इसके महत्व पर प्रकाष डाला। लक्ष्मीषंकर निगम ने उक्त षिलालेख पर नये सिरे से जानकारी प्रदान की है। इस अभिलेख में श्री पीलाराय के पुत्रों द्वारा रायपुर, आरंग, तथा राजिम में बनवाये गये तालाब तथा मंदिरों की चर्चा की गयी है। राजनैतिक दृष्टिकोण से षिलालेख से कुछ जानकारी नहीं मिलती है।
केषवदेव के शासनकाल में उल्लेखनीय घटना का वर्णन नही मिलता, उसके पुत्र तथा उत्तराधिकारी भुवनेष्वरदेव (सन् 1463-1478) का शासनकाल कतिपय उल्लेखनीय घटनाओं के कारण महत्वपूर्ण हैं।
भुवनेष्वरदेव के शासनकाल में नंदपुर (जयपुर, कोरापुर) के राजा विनायक देव के राज्य में विद्रोह फैल गया। विनायक देव विद्रोह को दबाने में असमर्थ थे। अतः उन्होंने भुवनेष्वर देव से सैन्य सहायता की याचना की। स्वयं विनायक देव रायपुर आये उन्होंने रायपुर को जैसा देखा उसका वर्णन इस प्रकार है- रायपुर समृद्ध व्यापारियों का नगर है। नगर के लोगों ने उसका सौहाद्रपूर्ण स्वागत किया। भुवनेष्वर ने जयपुर के राजा को शस्त्र तथा योद्धा देकर सहायता प्रदान की।
जयपुर की राजकन्या रतनपुर के राजा शंकरसहाय को ब्याही गयी थी। इस रिष्तेदार के कारण भुवनेष्वर देव ने विनायकदेव को सहायता देना अपना कर्तब्य समझा। भुवनेष्वरदेव के समय तक नदी तट पर जो किला था, वह ढह चुका था। अतः सन् 1460 में भुवनेष्वरदेव ने बुढ़ा तालाब के किले का निर्माण करवाया। इसके लिए रतनपुर नरेष शंकरसहाय ने भी धन की सहायता उपलब्ध की थी। भुवनेष्वरदेव के पिता केषवदेव ने इस स्थान पर पहलें ही अपना निवास स्थान बना लिया था। राजा का निवास होने के कारण किले के आसपास बस्ती विकसित हुई जो पुरानी बस्ती के नाम से जानी जाती रही। अब पुरानी बस्ती का नाम केवल इतिहास के पन्नों की ही शोभा बढ़ा सकता है। इतिहास के साथ छेड़-छाड़ करने में कुछ लोग बड़े चतुर होते हैं।
सन् 1650 में सोमदत्तसिंहदेव के समय दूधाधारी महाराज तुरतुरिया तपस्थली से रायपुर पधारे। सोमदत्तसिंहदेव ने उन्हें महाराजबंद के पास निवास के लिये स्थान दिया। सन् 1663 में बलदेवसिंहदेव रायपुर की गद्दी पर बैठे। रेवाराम बाबू ने लिखा है, कि उन्होंने ‘नया रायपुर‘ बसाया। संभवतः उनका आषय ‘नयापारा‘ से है। बलदेव सिंह देव का कोई पुत्र नही था।
अतः रतनपुर नरेष रणजीतसिंहदेव के समय उनके परिवार के मेरसिंह को रायपुर की गद्दी पर बैठाया गया। वे लगभग सन् 1685 के लगभग सिंहासनारूढ़ हुए। उन्होंने ‘रजबंधा तालाब‘का निर्माण करवाया। उनके पुत्र बरियारसिंहदेव सन् 1705 में गद्दी पर बैठे। उन्होंने राजा तालाब‘ का निर्माण करवाया। बरियारसिंहदेव के दीवान रामचन्द्र कोका के पुरानी बस्ती में एक तालाब का निर्माण करवाया जो आजकल ‘खो-खो तालाब‘ के नाम से प्रसिद्ध हैं।
बरियारसिंहदेव के पष्चात् उनके पुत्र अमरसिंहदेव सन् 1735 में रायपुर की गद्दी पर बैठे। वे स्वयं अच्छे कवि तो थे ही विद्धानों के आश्रयदाता भी थे। रतनपुर के महाकवि गोपाल मिश्र के पुत्र पिंगलाचार्य कवि माखन अमरसिंहदेव के राज्याश्रित कवि थे। कवि माखन ने छंदविलास नामक छंदषास्त्र पर ग्रंथ लिखा। डाॅ. नगेन्द्र ने उनहें हिन्दी के रीतिकाल के छः आचार्य कवियों में प्रमुख स्थान दिया है।6
राजा अमरसिंह का एक ताम्रपत्र संवत् 1792 विक्रम (सन् 1735) आरंग जिला रायपुर में पाया गया है। जिसमें राजा अमरसिंहदेव ने नंदू ठाकुर को कुछ रियासतें बख्शी थी। आरंग ताम्रपत्र में उल्लेख है कि राजा अमरसिंह ने नन्दू ठाकुर और घासीराय को छींटा (सामान्य विवाह) बूंदा (विधवा विवाह, पुर्नविवाह), गयारि (परित्यक्ता स्त्री से विवाह) तथा मई मुआरि (परिवार में मृत व्यक्ति की संपत्ति) पर कर देने हेतु छूट प्रदान की थी। यह ताम्रपत्र छत्तीसगढ़ के तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। मिराषी का मानना है कि अमरसिंहदेव का ताम्रपत्र लेख जो कलचुरि वंष से संबद्ध माना जाता है, में वंषावली का उल्लेख नहीं है एवं ऐतिहासिक महत्व का नहीं हैं।
अमरसिंह देव इस वंष के अंतिम राजा थे तथा वे 1750 ई. तक राज्य करते रहे। सन् 1750 में रायपुर पर नागपुर के भोंसलों का शासन स्थापित हो गया।
संदर्भ सूची
1ण् पाण्डेय, ऋषिराज, छत्तीसगढ़ (दक्षिण कोसल) के कलचुरि, पृ.125
2ण् यदु, हेमू, छत्तीसगढ़ का वैभवषाली इतिहास, पृ.48-49
3ण् उपरोक्त, पृ.49
4ण् वर्मा, भगवान सिंह, छत्तीसगढ़ का इतिहास, पृ.38
5ण् पाण्डेय, ऋषिराज, पूर्वोक्त, पृ.130-131
6ण् उपरोक्त, पृ.132-133
Received on 15.03.2019 Modified on 20.04.2019
Accepted on 27.05.2019 © A&V Publications All right reserved
Int. J. Rev. and Res. Social Sci. 2019; 7(4):777-781.